संदेश

भगवान का अर्थ

 भगवान का अर्थ हम लोग क्या मानते है यह हमारी अपनी रुचि का विषय है, पर क्या आप जानते है की वर्षो से इस नाम का प्रयोग करके लाखो लोगो ने अपनी गलतियों को छिपाया है। अक्सर हम हर चीज में भगवान को बीच मे लाकर खड़ा कर देते है, चाहे वह हमारी कोई भी खुद की गई गलती ही क्यों न हो। वास्तव में यह एक गलत अवधारणा समय के चलते बनी हुई है। हम शायद इतने सक्षम नहीं है की भगवान के स्वरूप के अस्तित्व को समझ सके हम नही जान सकते की भगवान है या नहीं इसकी कल्पना करना भी बिल्कुल तर्कहीन बात है।पर हम हमेशा इस बात पर बहस करना चाहते है की भगवान है या नहीं है वह देख रहा है या नहीं वास्तव में इस बात में तर्क है लोग हमेशा चाहते है की वो अपनी गलतियों को दुसरो के ऊपर थोप दे यही परंपरा सदियों से चली आ रही है आज भी सतत रूप से चल रही है। तो लोगो ने भगवान शब्द खोजा और उसी पर निर्भर हो गए।  लेकिन यह बात यही तक तो रहनी नही थी की यह एक युग में हो जाता परंतु फिर भी जब इसकी खोज हुई तब लोग जागरूक थे क्योंकि यह सब उन्ही लोगो ने बनाया फिर जब वो लोग ही नहीं रहे और पीढ़ी बदलती गई तो यह अंधविश्वास में बदलता गया।  आज के इस...

नारी सशक्तिकरण

 ‘यत्र नार्यस्तु पूजयंते, रमयंते तत्र देवता’ जहा नारी की पूजा होती है देवता भी वही निवास करते है, यह वाक्य अपने आप में ही एक ऐसा वाक्य है जो सम्पूर्ण सार समेटे हुए है। अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आज महिला सशक्तिकरण की बात हम कर रहे है। मुझे लगता है की महिलाओं के सशक्तिकरण की जब भी बात होती है तब वह राजनीतिक और आर्थिक आधार पर ही सिमटकर रह जाती है जबकि महिला सशक्तिकरण के लिए सबसे प्रमुख आधार महिलाओं का सामाजिक विकास है, हमारी सरकार ने महिला सशक्तिकरण के विषय में अत्याधिक कार्य नहीं किया परंतु जितना किया वह बहुत ही कम है, फिर भी सराहनीय है।वर्तमान समय में महिला वर्ग काफी सशक्त हुआ है प्रमुखता शहर में रहने वाली महिलाओं का विकास हुआ है परंतु अभी भी। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएं अभी भी समाज की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाई है, ग्रामीण क्षेत्र में तो राजनीतिक स्तर पर भी महिलाएं इतनी विकसित नहीं हो पाई है भले ही सरकार ने महिलाओं को चुनाव में भाग लेने के लिए नियम बना दिए हो लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी जाकर देखे तो शायाद ही किसी भी गाल में महिलाएं जमीनी स्तर पर जाकर कार्य करती हो ग्रामीण ...

आध्यत्मवाद

 Blog of the day आध्यत्मवाद –  आज के वर्तमान समय में आपने बहुत से लोगो को आध्यात्म की ओर जाते हुए देखा होगा। किन्तु क्या आपको पता है की उनमें से कितने लोग सही तौर पर अध्यात्म की ओर जाना चाहते है, आपको यह समझने में थोड़ा भी समय नहीं लगेगा की आप आध्यात्म की ओर जाना चाहते है या नहीं। सिर्फ आपको उस व्यक्ति के बारे में थोड़ी जानकारी प्राप्त करनी होगी। आजकल के इस युग में आध्यात्म को इस तरह समझा जाता है कि यदि कोई उद्देश्य नहीं है तो आध्यात्म ही अंतिम उद्देश्य है, सही मायने में ऐसे व्यक्ति आध्यात्म की ओर जाना ही नहीं चाहते। क्योंकि लोगो में आध्यात्म की सोच विकसित तब होती है जब वे लोग कही पर असफल हो जाते है या थक कर बैठ जाते है, क्या अध्यात्म आपको रुकना सिखाता है? बिल्कुल नही आध्यात्म के मार्ग से आप निरंतरता और तटस्थता की ओर अग्रसर होते है, तो आप यह क्यो समझते है कि यदि हम थक कर हार कर बैठ गए है तो अब आध्यात्म की ओर जाना चाहते है, इस तरह के व्यक्ति सिर्फ आध्यात्म को दिखाना चाहते है, यह बहुत ही भद्दा और खोखलापन कहलाता है। आध्यात्म की ओर सही मायने में बढ़ना मतलब अपने लक्ष्य केपराती अग्र...

शिक्षा, महत्व एवं प्रभाव

  ''शिक्षा, एक सभ्य समाज के लिए सर्वोत्तम उपाय है।'' '' शिक्षा जीवन का अभिन्न अंग है, जिसके बिना जीवन निरर्थक है।'' शिक्षा को जीवन का आधार कहना थोड़ा भी अनुचित नहीं लगता। शिक्षा हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। एक शिक्षित व्यक्ति और एक अशिक्षित व्यक्ति के जीवन को देखकर हम बहुत अच्छी तरह फर्क कर सकते है। हिन्दू धर्म में शिक्षा को तो बहुत पहले से ही एक आवश्यक अंग जीवन के लिए मना गया है। भारत हमेशा से ही विश्व गुरु रहा है। विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय हो जिसमे हम तक्षशिला कि बात करे या नालंदा विश्वविद्यालय की दोनों ही प्राचीन काल से ही भारतीयों के साथ साथ विदेशियों के लिए भी शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान रहे है। हमे यह कहने में गर्व महसूस होना चाहिए कि हम उस देश के निवासी है जहां प्राचीन समय से शिक्षा पर बल दिया जा रहा है। हा यह बात थोड़ा अलग है कि शिक्षा में सभी को समान अधिकार देने के क्षेत्र में भारत हमेशा से ही पीछे रहा है चाहे हम बात करे पहले कि या अभी के समय की हमारे सामने हमेशा से यह परेशानी रही है कि किस तरह हम शिक्षा को सभी के लिए समान अवसर निकाल ...

आस्था

आस्था, आत्मविश्वास और सकारात्मकता कि ओर बढ़ने का प्रथम और सबसे आवश्यक कदम है। आस्था का शाब्दिक अर्थ है - उस वस्तु या विषय के प्रति सकारात्मक होना। आस्था का जन्म ही सकारात्मक भावना से होता है। आजकल हम आस्था का वास्तविक अर्थ समझे बिना ही टिप्पणी करते है जिसका एक महत्वपूर्ण कारण आडंबर, पाखंड, दिखावा और अन्य सामाजिक समस्याएं निकलकर आ रही है। सर्वप्रथम हम आस्था को अच्छी तरह से समझे और विचार करके देखे कि हम जिस तरह से किसी के प्रति आदर भाव रख रहे है वास्तव में वह आस्था है या नहीं। जिस तरह हम अपने अपने ईश्वर के प्रति विश्वास रखते है हमारे मन में उनके लिए अपार श्रद्धा होती है, हम उनसे प्रेम करते है, हम उनके सामने अपने सारे सुख दुख बाटते है अर्थात हमारी उनमें गहरी आस्था है, परन्तु क्या यह आस्था सच्ची है या हम जिस तरह को आस्था रख रहे है वास्तव में यही उसका वास्तविक अर्थ है यह जानना आज हमारे लिए जरूरी हो गया है। आस्था के विषय में जानना अपने आप में एक ऐसी जानकारी पाना है जिससे हमारा देखने का नजरिया बदलना ही है। यह बिल्कुल प्रेम कि शक्ति को तरह है। आस्था हमे सकारात्मकता प्रदान करती है। वर्तमान समय ...

प्रकृति

  प्रकृति , नाम ही इतना अत्यंत सुंदर है कि इसको महसूस करने से ही मन में एक उमंग सी भर जाती है। प्रकृति ने हमें कितना कुछ नहीं दिया। मानव सभ्यता के शुरुआत से ही प्रकृति ने हमे हर चीज दी है। वर्तमान मानव सभ्यता को देखकर प्रतीत होता है कि मानव का इस प्रकृति से कुछ लेना देना ही नहीं है। मुझे लगता है कि मानव सभ्यता का अंत का सबसे बड़ा कारण प्रकृति के महत्व को न समझना ही होगा।  आज के लोग घरों में ए सी का प्रयोग करने में सक्षम है परन्तु कुछ पेड़ लगाकर अपने घर के आस पास के वातावरण को शुद्ध करने में उन्हें समस्या होती है। उनके पास आज इतना समय नहीं है कि वो अपने जीवन का कुछ समय कुछ पेड़ो को देकर कुछ प्रकृति को वापस लौटा दे।  हम मानव भी इतने कमजोर दिल के है चुके है कि इतना विकास करने के बावजूद सब कुछ जानते हुए इसका दोहन आसानी से कर जाते है। भौतिक सुविधाओं में घिर चुके है हम । यही हमारे अंत का कारण बनता है। हम वैकेशन में कोई प्राकृतिक स्थान जाकर कुछ पल के आनंद लेकर भूल जाते है, काश कि हम इसके महत्व को अच्छी तरह समझकर हर जगह प्राकृतिक वातावरण बनाए। मुझे लगता है भौतिक सुविधाओं के इस यु...

सकारात्मक सोच

 क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि हम क्या सोच रहे है? और क्यों सोच रहे है। असल में हमारी जिंदगी के काफी सारे अच्छे पल सिर्फ सोचने में ही निकल जाते है। ध्यान देने वाली बात ये है कि हम नकारात्मक विचार को जल्द ही पकड़ लेते है जबकि सकारात्मक विचार को नहीं पकड़ पाते। आइए जानते है कि हम अपनी सोच को केसे सकारात्मकता कि तरफ ले जाए। सोचना मानव कि एक साधारण प्रक्रिया है। हर व्यक्ति सोचता है। और मजे कि बात यह है कि व्यक्ति हमेशा नकारात्मक बातो को ज्यादा सोचता है और उन्ही में उलझ कर फस जाता है। आप किसी भी परिस्थिति में क्यों न हो चाहे वह आर्थिक,पारिवारिक,शारीरिक या कोई सी भी समस्या क्यों न हो आप उस स्थिति में नकारात्मक विचारो के एक जाल में फस जाते है। और समस्या और दुगुनी लगने लगा जाती है।  आपको यह तो पता होगा की आपका जीवन है तो इसमें सुख और दुख दोनों ही स्थितियां बनेगी। और साथ में यह भी जान लीजिए यदि एक ही स्थिति में आप रहे तो आप रह ही नहीं पाएंगे।  सकारात्मकता की तरफ आगे बढ़ने का एकमात्र उपाय है - प्रैक्टिकली थिंकिंग और स्वयं पर विश्वास। हमारे दिमाग में विचार आयेंगे किन्तु हम उन वि...

मास्क

 मास्क एक "समस्या तथा समाधान" मास्क एक ऐसा शब्द जो आज के समय में हर कोई जानता है। एक समय ऐसा था जब मास्क शब्द किसी को नहीं पता होता था, पिछले कुछ महीनों में मानव जीवन में मास्क की मह्त्ता अत्यंत तेजी से बढ़ी है। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण सम्पूर्ण मानव जाति का मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया है लेकिन क्या आप जानते है कि हम अभी तक इस महामारी से इतने उबर भी नहीं पाए और बहुत सारे लोगो ने मास्क का प्रयोग करना बंद कर दिया है। जब में इन लोगो कि तरफ देखता हूं तो मुझे लगता है इन लोगो में अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी थोड़ी सी भी नहीं है। मास्क अब कुछ अच्छे कार्यालयों में, बड़े बड़े मॉल, तथा कुछ अन्य प्रतिष्ठित स्थानों में ही रह गया है। सार्वजनिक स्थानों पर विभिन्न ऐसी जगहों पर मास्क तो दिखता ही नहीं है। हमे इस बात को समझना होगा कि यह कितना जरूरी है, न सिर्फ कोरोना जैसी बीमारी बल्कि अन्य कई बीमारी से भी मास्क हम बचाता है। इसका एक और पहलू देखा जाए तो हमारे कचरो में एक और वस्तु बढ़ गई है वह है मास्क। मास्क का उपयोग पिछले कुछ महीनों में इतना हुआ है कि हम अंदाजा भी नहीं लगा ...