आस्था

आस्था, आत्मविश्वास और सकारात्मकता कि ओर बढ़ने का प्रथम और सबसे आवश्यक कदम है।

आस्था का शाब्दिक अर्थ है - उस वस्तु या विषय के प्रति सकारात्मक होना। आस्था का जन्म ही सकारात्मक भावना से होता है। आजकल हम आस्था का वास्तविक अर्थ समझे बिना ही टिप्पणी करते है जिसका एक महत्वपूर्ण कारण आडंबर, पाखंड, दिखावा और अन्य सामाजिक समस्याएं निकलकर आ रही है। सर्वप्रथम हम आस्था को अच्छी तरह से समझे और विचार करके देखे कि हम जिस तरह से किसी के प्रति आदर भाव रख रहे है वास्तव में वह आस्था है या नहीं। जिस तरह हम अपने अपने ईश्वर के प्रति विश्वास रखते है हमारे मन में उनके लिए अपार श्रद्धा होती है, हम उनसे प्रेम करते है, हम उनके सामने अपने सारे सुख दुख बाटते है अर्थात हमारी उनमें गहरी आस्था है, परन्तु क्या यह आस्था सच्ची है या हम जिस तरह को आस्था रख रहे है वास्तव में यही उसका वास्तविक अर्थ है यह जानना आज हमारे लिए जरूरी हो गया है।

आस्था के विषय में जानना अपने आप में एक ऐसी जानकारी पाना है जिससे हमारा देखने का नजरिया बदलना ही है। यह बिल्कुल प्रेम कि शक्ति को तरह है। आस्था हमे सकारात्मकता प्रदान करती है। वर्तमान समय में व्याप्त गंभीर समस्या जैसे अवसाद जैसी गंभीर स्थितियों से बाहर निकलने में यह अत्यंत जरूरी विषय हो जाता है।

आस्था का सीधा सा अर्थ है - किसी भी के लिए प्रेम होना, और प्रेम होने के कारण ही सकारात्मक भावना होना। जहा पर आस्था जैसे शब्द कि बात होती है वहां पर नकारात्मक विचार नहीं आते। 

वर्तमान समय में हम अपनी आस्था विभिन्न हास्यास्पद विषयों में रखते है और दिखाते है। कई लोगो को मैंने देखा है दिन भर पूजा करते है परन्तु कभी किसी कि मदद नहीं करते, कुछ लोग भगवान के प्रति आदर रखते है परन्तु अपने ही माता पिता या किसी के साथ दुर्व्यवहार करते है। कुछ व्यक्ति आस्था दिखाकर अन्य लोगो को परेशान करते है और उग्रता पूर्वक कार्य भी करते है। भगवान में आस्था दिखाकर लड़ाइयां करवाना कहा कि आस्था है, ऐसी स्थिति उत्पन्न करना जहा बेकसूर लोगो को समस्या हो यह कहा कि आस्था है,अपने धर्म को श्रेष्ठ मानकर चलना और दूसरे धर्म को नीचा दिखाना कहा कि आस्था है, इस तरह के लोगो में किसी भी के प्रति आस्था नहीं होती। 

वैदिक काल में भी लोग अपने ईस्ट कि पूजा करते थे परन्तु इस तरह कि आस्था ना थी। आजकल कि तरह हमारा समाज इतना बटा नहीं था। जातीय व्यवस्था थी पर किसी का इतना अपमान नहीं था सबकी अपनी प्रतिष्ठा थी। समय बीतता गया और इनके अर्थ हमने स्वयं ही निश्चित कर लिए बिना कुछ जाने समझे। यदि इस तरह से चलता रहा तो जल्द ही हम दोबारा बट जाएंगे।

सदियों से चलता आ रहा हमारा एकता का सपना पल भर में बिखर जाएगा। क्योंकि यह बात समझने योग्य है कि आज हमारे बीच दरार डालने वाले व्यक्तियों ने हमे इतना कमजोर कर दिया है कि हम एक छोटी सी अपवाह पर किसी से भी भिड़ जाते है, भौतिकता के इस युग में हम धीरे धीरे नियंत्रित किया जा रहा है हमारी सोच को और हमे नियंत्रित किया जा रहा है, असल में हम हमारा कर्तव्य नहीं समझते है और हम किसी और के कहने पर ही मान लेते है। यह पूरी तरह ग़लत है। आज समय ये है कि हमारे नेता हमसे धर्म के नाम पर वोट ले जाते है और हम पता तक नहीं चलता जबकि हमारा  संविधान धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, तो यह केसे? 

प्रिय साथियों, मेरा आपसे यही निवेदन है कि इस शब्द कि गहराई को अच्छी तरह से समझिए और स्वविवेक से निर्णय लीजिए और आस्था को मानवता के साथ जोड़कर देखिए आप अपने अंदर सकारात्मकता पाएंगे। 


धन्यवाद्

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