भगवान का अर्थ
भगवान का अर्थ हम लोग क्या मानते है यह हमारी अपनी रुचि का विषय है, पर क्या आप जानते है की वर्षो से इस नाम का प्रयोग करके लाखो लोगो ने अपनी गलतियों को छिपाया है। अक्सर हम हर चीज में भगवान को बीच मे लाकर खड़ा कर देते है, चाहे वह हमारी कोई भी खुद की गई गलती ही क्यों न हो। वास्तव में यह एक गलत अवधारणा समय के चलते बनी हुई है।
हम शायद इतने सक्षम नहीं है की भगवान के स्वरूप के अस्तित्व को समझ सके हम नही जान सकते की भगवान है या नहीं इसकी कल्पना करना भी बिल्कुल तर्कहीन बात है।पर हम हमेशा इस बात पर बहस करना चाहते है की भगवान है या नहीं है वह देख रहा है या नहीं वास्तव में इस बात में तर्क है लोग हमेशा चाहते है की वो अपनी गलतियों को दुसरो के ऊपर थोप दे यही परंपरा सदियों से चली आ रही है आज भी सतत रूप से चल रही है। तो लोगो ने भगवान शब्द खोजा और उसी पर निर्भर हो गए।
लेकिन यह बात यही तक तो रहनी नही थी की यह एक युग में हो जाता परंतु फिर भी जब इसकी खोज हुई तब लोग जागरूक थे क्योंकि यह सब उन्ही लोगो ने बनाया फिर जब वो लोग ही नहीं रहे और पीढ़ी बदलती गई तो यह अंधविश्वास में बदलता गया।
आज के इस युग में हम सभी जानते है कि भगवान यदि कुछ अच्छा भी करना चाहे तो कुछ लोगो के लिए बुरा होगा, क्योंकि सकारात्मक और नकारात्मक पहलू हर चीज के होते ही है।
समय बदलता गया और लोगो ने उस शब्द को मूर्त रूप दे दिया। हम हमेशा से ही समय और परिस्थियों के अनुरूप ही चलते आए है उदाहरण के लिए सिंधु घाटी सभ्यता के समय पाशुपत की पूजा होती थी, बैल, अग्नि, वरुण, जल इनकी पूजा की जाती रही क्योंकि यह सभ्यता भी पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी वैदिक काल में गाय की पूजा की जाने लगी क्योंकि गाय से प्राप्त उत्पाद दूध, दही, घी, गोबर, मक्खन सभी से लोगो को लाभ हुआ अर्थात गाय की पूजा अपने स्वार्थ के लिए की गई और दूसरी बात यह भी है की गाय की पूजा उसे संरक्षण के लिए की गई जैसे आजकल पीपल की पूजा करके संरक्षण किया जाता है, वैदिक सभ्यता में गाय को खाने तक की बाते सामने आती है, जो की तथ्य है इन्हे पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। इस तरह हमने पूजा उसकी की जिससे हमे लाभ हुआ।
तो फिर भगवान शब्द को इतना क्यों फैलाया गया इसका क्या कारण हो सकता है, क्या आपने कभी सोचा है, यह पर आप भगवान का अस्तित्व नकारने से नास्तिक नही होंगे और स्वीकारने से आस्तिक नही होंगे। चलिए इस बात को समझते है, वास्तव में भगवान की कल्पना सत्य है पर वह कल्पना सभी जादू से अलग है उनका अस्तित्व अलग है।
राम, कृष्ण,दुर्गा माता या अन्य सभी सामान्य व्यक्ति की तरह ही जन्मे उन्होंने अपने समय में बहुत ही बेहतरीन कार्य किए जिस तरह आज के समय में महत्मा गांधी जी, अब्दुल कलाम आजाद जी, या फिर भीमराव अंबेडकर, या लियोनार्डो दा विंची, जॉर्ज वॉशिंगटन ये सभी हमारे लिए पूज्यनीय है। इन्हें भी भगवान कहा जा सकता है परंतु एक समय के बाद enhe भगवान कहा जाएगा यह निश्चित रूप से सत्य है।
तो हम सभी भी भगवान के इस स्वरूप को क्यों नहीं मानते। इस बात में भी तथ्य है भगवान के मानव स्वरूप में मानने के बाद हम अपने आपको कमजोर बताने लगते है हम महसूस करते है की हम वाकई में कमजोर है, जो सत्य है हमे पता है पर हम अपने अहंकार के कारण अपनाते नही है, जिन्होंने अपनाया उन्होंने सुधार किया जो हमेशा इस बात से अपने आपको अंधेरे में रखते आए उन्होंने हमेशा अपनी गलतियों का दोष किसी और के ऊपर रखा।
वास्तव में हमारी इस सामाजिक दुनिया में विशेष तौर पर भारतीय संस्कृति में एक भय बन चुका है की यदि आप कुछ अच्छा करना चाहते है और उसमे असफलता है तो आप समाज के दर के कारण नहीं करेंगे। इसी असफलता के लिए हमने भगवान नाम बनाया जिसके ऊपर हम सारी समस्या दल देते है।
सभी को पता है की वर्तमान समय में पेड़ कितने महत्वपूर्ण है, तो यह बात बिलकुल आतर्किक होगी की पेड़ कटकर हम मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा,चर्च बनाए। हां ऐसे लाभ होता तो बनाते क्योंकि यह बात सौ फीसदी सही है की ऑक्सीजन हमे पेढ़ ही प्रदान करते है तो हमने वर्तमान समय में विकास की दौड़ में इतने आगे बढ़ गए की पेड़ आज सिर्फ गार्डन, सड़को के दोनो ओर या फिर कुछ निश्चित चुनिंदा स्थानों पर मिलते है वह भी व्यवस्थित और सजे हुए कुछ समय के बाद इनकी संख्या और काम होगी किसी कॉलोनी में एकमात्र पेड़ होगा तो वह उस कॉलोनी के लिए भगवान ही होगा। तो इस तरह भगवान का जन्म होता है।
वर्तमान समय में कुछ लोग तर्क देते है की उन ग्रंथो को क्या कहेंगे जो स्वयं भगवान ने लिखे या बोले, उस बहस को समझने के लिए तो पहली बात पूरी तरह से ऐतिहासिक खोज की आवश्यकता है और दूसरी बात इस बात पर तर्क के साथ समझने का प्रयास करिए की वो सभी ग्रंथ हमे कही यह नही बताते की भगवान का एक निश्चित अस्तित्व है वे सिर्फ ये बताते है कि आप उनका प्रयोग करके अपने जीवन को नवीन ऊंचाई पर ले जाए। हमे ग्रंथो को एक शिक्षा की भाती और भगवान को सिर्फ आदर्श की भाती मानना चाहिए और सभी क्रियाकलापों पर स्वयं की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
मेरे शब्दों में भगवान का अस्तित्व है तो भी ठीक है और नही है तो भी ठीक है इस जन्म में आपको भगवान के दर्शन मात्र मूर्त रूप में होंगे और आप जीवन भर उसी अंधविश्वास में जीते रहेंगे। निष्कर्ष स्वरूप भगवान को आदर्श मानकर अपने सभी कर्मो को एक निश्चित और सही दिशा देकर कार्य करना ही भगवान की इच्छा के स्वरूप चलना है।
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