प्रकृति

 प्रकृति, नाम ही इतना अत्यंत सुंदर है कि इसको महसूस करने से ही मन में एक उमंग सी भर जाती है। प्रकृति ने हमें कितना कुछ नहीं दिया। मानव सभ्यता के शुरुआत से ही प्रकृति ने हमे हर चीज दी है। वर्तमान मानव सभ्यता को देखकर प्रतीत होता है कि मानव का इस प्रकृति से कुछ लेना देना ही नहीं है। मुझे लगता है कि मानव सभ्यता का अंत का सबसे बड़ा कारण प्रकृति के महत्व को न समझना ही होगा। 

आज के लोग घरों में ए सी का प्रयोग करने में सक्षम है परन्तु कुछ पेड़ लगाकर अपने घर के आस पास के वातावरण को शुद्ध करने में उन्हें समस्या होती है। उनके पास आज इतना समय नहीं है कि वो अपने जीवन का कुछ समय कुछ पेड़ो को देकर कुछ प्रकृति को वापस लौटा दे। 

हम मानव भी इतने कमजोर दिल के है चुके है कि इतना विकास करने के बावजूद सब कुछ जानते हुए इसका दोहन आसानी से कर जाते है। भौतिक सुविधाओं में घिर चुके है हम । यही हमारे अंत का कारण बनता है।

हम वैकेशन में कोई प्राकृतिक स्थान जाकर कुछ पल के आनंद लेकर भूल जाते है, काश कि हम इसके महत्व को अच्छी तरह समझकर हर जगह प्राकृतिक वातावरण बनाए।

मुझे लगता है भौतिक सुविधाओं के इस युग में ये तो होना ही था परन्तु हमारे पास और भी दूसरे उपाय है जिनका उपयोग करके हम आगे कि जिंदगी को अच्छा बना सकते है, हमे यह महसूस करते हुए शर्म आनी चाहिए कि जिस प्रकृति कि गोद में हमारी सम्पूर्ण सभ्यता विकसित हुईं आज उसे है बचाने के लिए कार्यक्रम चलाए जा रहे है, क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि जिसने हमे इतनी खूबसूरत जिंदगी दी जिसकी वजह से हम इन सारी सुविधाओ का उपयोग कर पा रहे है उसे हम सुरक्षित रखे। में तो ये सोचकर भी हैरान रह जाता हूं कि मानव सभ्यता का आगे का जीवन किस तरह होगा। यदि ऐसी तरह से चलता रहा तो निश्चित ही हमे ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर बाहर निकलना पड़ेगा। 

मुझे लगता है कि प्रकृति को हम यदि कुछ दे नहीं सकते तो उसका दोहन तो बिल्कुल किसी भी कीमत पर ना करे। प्रकृति में स्वयं में इतनी क्षमता है कि वह अपना विकास अपने अनुसार कर सकती है। 

हमे इस पर गहन विचार करके इस प्रकृति कि सुंदरता को महसूस करके इसे बचाने का भरसक प्रयास करना चाहिए। ये भी हमारे ही लिए है, ना कि किसी और के लिए।

धन्यवाद्

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